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लिव-इन रिलेशनशिप- फैशन!!! कल्चर!!! प्यार या धोंखा ???

इसी सवाल के साथ मैं अपना लेख शुरू करता हूँ, कि लिव-इन रिलेशनशिप की वजह क्या है, क्या दिन पर दिन बढ़ता फैशन है ??? या वेस्टर्न कल्चर का ऐडापशन ??? या प्यार का एक नया रूप ??? या ये सिर्फ एक धोखा, एक छलावा है ???
हम सभी जानते हैं कि भारत एक सांस्कृतिक देश है और इसी संस्कृति, इसी कलचर के कारण हम विश्व मे जाने जाते हैं। भारत एक ऐसा देश है जहाँ धरती को माँ माना जाता है, जहाँ सूर्य को भगवान और जहाँ पति को परमेश्वर का दर्जा दिया जाता है। लेकिन आज अगर देंखे तो शायद भारत की संस्कृति, भारत का कल्चर धूमिल होता नज़र आ रहा है। लिव इन रिलेशनशिप की अगर बात करें तो ये हमारी संस्कृति हमारी सभ्यता के विपरीत है। इसके पीछे तर्क बस इतना है, कि इसमें कोई बन्दिश नहीं है। जब तक आपको सही लगे आपका मन करे तब तक आप साथ रहें। ऐसे में आज की य़ुवा पीड़ी का एक ही चहरा सामने आता है, कि वो अधिकार तो चाहते हैं लेकिन बिना किसी बन्दिश के। रिश्ते तो चाहते हैं परतुं जिम्मेदारियाँ नहीं। और अगर हम पश्चिमी सभ्यता को देखें तो वहाँ ये सब प्रचलन में है, एक आम बात है। और शायद उसी को देख हम अपनी संस्कृति अपनी सभ्यता को भूल लिव-इन जैसे रिश्ते स्वीकारने लगे हैं।
आज युवा जब प्रेम संबंधों में पड़ते हैं तो उन्हें कुछ समय बाद लगने लगता है कि विवाह से पहले एक साथ रहना बहुत जरूरी है, ताकी वे एक-दूसरे को और बेहतर समझ सके, और ये तय कर सकें कि वे एक दूसरे के साथ रह भी पाएगें या नहीं और यदी किसी कारणवर्ष ऐसा नहीं हो पाता, और एक दूसरे से अलग होना पड़ता है तो ऐसे में सबसे ज्यादा असर लड़कियों पर पड़ता है, चाहे वह शारीरिक रूप से हो, मानसिक रूप से या सामाजिक रूप से। मेरा मानना है कि ऐसे प्रेम संबन्ध प्रेम पर नहीं सिर्फ शारीरिक आकर्षण पर निर्भर होते हैं और जैसे-जैसे आकर्षण कम होने लगता है प्रेम संबन्धों में खटास आने लग जाती है और धीरे-धीरे लड़ाई-झगड़े शुरू हो जाते हैं।
आठ अक्टूबर को जैसे ही सरकार ने घोषणा की, कि धारा 125 के स्पष्टीकरण में पत्नी शब्द में लिव-इन-रिलेशनशिप में रहने वाली महिलाओं को भी सम्मिलित किया जाना प्रस्तावित है। वैस ही मानों जैसे युवाओं को ग्रीन सिगनल मिल गया हो, मौजूदा हालात अगर देखें तो युवा आज क्लब, नाइट लाइफ और मॉल कल्चर के चलते स्वार्थी होता जा रहा है और अपने माँ-बाप के प्रति अपने दायित्वों को भूल लिव इन रिलेशनशिप में रहना सही समझ रहा है और भूल रहा है कि कोई भी माँ-बाप ये नहीं चाहेंगे कि उनका बेटा विवाह से पहले किसी लड़की के साथ या बेटी किसी लड़के के साथ सम्बन्ध बनाकर उनसे दूर उन्हें बिना बताए रहे।
मैं सिर्फ इतना कहूँगा कि यदि हम इसे प्रेम कह्ते है, तो शायद हम प्रेम का अर्थ ही भूल गये है। प्रेम निस्वार्थ होता है, इसमें शर्ते नहीं होती और विवाह से पहले साथ रहकर ये नहीं देखा जाता कि हम साथ रह भी पाएंगे या नहीं। और आज अगर हम ऐसा कर रहें है तो वो प्यार नहीं, एक तरह का बाज़ारूपन है, फर्क सिर्फ इतना है कि वहाँ बिना मर्ज़ी के सब चलता है और यहाँ दोनों की मर्ज़ी से।
और अंत में आप सभी से मेरा प्रश्न यही है कि--- लिव-इन रिलेशनशिप- फैशन !!! कल्चर !!! प्यार या धोंखा ???
- राघव सहाय
हम सभी जानते हैं कि भारत एक सांस्कृतिक देश है और इसी संस्कृति, इसी कलचर के कारण हम विश्व मे जाने जाते हैं। भारत एक ऐसा देश है जहाँ धरती को माँ माना जाता है, जहाँ सूर्य को भगवान और जहाँ पति को परमेश्वर का दर्जा दिया जाता है। लेकिन आज अगर देंखे तो शायद भारत की संस्कृति, भारत का कल्चर धूमिल होता नज़र आ रहा है। लिव इन रिलेशनशिप की अगर बात करें तो ये हमारी संस्कृति हमारी सभ्यता के विपरीत है। इसके पीछे तर्क बस इतना है, कि इसमें कोई बन्दिश नहीं है। जब तक आपको सही लगे आपका मन करे तब तक आप साथ रहें। ऐसे में आज की य़ुवा पीड़ी का एक ही चहरा सामने आता है, कि वो अधिकार तो चाहते हैं लेकिन बिना किसी बन्दिश के। रिश्ते तो चाहते हैं परतुं जिम्मेदारियाँ नहीं। और अगर हम पश्चिमी सभ्यता को देखें तो वहाँ ये सब प्रचलन में है, एक आम बात है। और शायद उसी को देख हम अपनी संस्कृति अपनी सभ्यता को भूल लिव-इन जैसे रिश्ते स्वीकारने लगे हैं।
आज युवा जब प्रेम संबंधों में पड़ते हैं तो उन्हें कुछ समय बाद लगने लगता है कि विवाह से पहले एक साथ रहना बहुत जरूरी है, ताकी वे एक-दूसरे को और बेहतर समझ सके, और ये तय कर सकें कि वे एक दूसरे के साथ रह भी पाएगें या नहीं और यदी किसी कारणवर्ष ऐसा नहीं हो पाता, और एक दूसरे से अलग होना पड़ता है तो ऐसे में सबसे ज्यादा असर लड़कियों पर पड़ता है, चाहे वह शारीरिक रूप से हो, मानसिक रूप से या सामाजिक रूप से। मेरा मानना है कि ऐसे प्रेम संबन्ध प्रेम पर नहीं सिर्फ शारीरिक आकर्षण पर निर्भर होते हैं और जैसे-जैसे आकर्षण कम होने लगता है प्रेम संबन्धों में खटास आने लग जाती है और धीरे-धीरे लड़ाई-झगड़े शुरू हो जाते हैं।
आठ अक्टूबर को जैसे ही सरकार ने घोषणा की, कि धारा 125 के स्पष्टीकरण में पत्नी शब्द में लिव-इन-रिलेशनशिप में रहने वाली महिलाओं को भी सम्मिलित किया जाना प्रस्तावित है। वैस ही मानों जैसे युवाओं को ग्रीन सिगनल मिल गया हो, मौजूदा हालात अगर देखें तो युवा आज क्लब, नाइट लाइफ और मॉल कल्चर के चलते स्वार्थी होता जा रहा है और अपने माँ-बाप के प्रति अपने दायित्वों को भूल लिव इन रिलेशनशिप में रहना सही समझ रहा है और भूल रहा है कि कोई भी माँ-बाप ये नहीं चाहेंगे कि उनका बेटा विवाह से पहले किसी लड़की के साथ या बेटी किसी लड़के के साथ सम्बन्ध बनाकर उनसे दूर उन्हें बिना बताए रहे।
मैं सिर्फ इतना कहूँगा कि यदि हम इसे प्रेम कह्ते है, तो शायद हम प्रेम का अर्थ ही भूल गये है। प्रेम निस्वार्थ होता है, इसमें शर्ते नहीं होती और विवाह से पहले साथ रहकर ये नहीं देखा जाता कि हम साथ रह भी पाएंगे या नहीं। और आज अगर हम ऐसा कर रहें है तो वो प्यार नहीं, एक तरह का बाज़ारूपन है, फर्क सिर्फ इतना है कि वहाँ बिना मर्ज़ी के सब चलता है और यहाँ दोनों की मर्ज़ी से।
और अंत में आप सभी से मेरा प्रश्न यही है कि--- लिव-इन रिलेशनशिप- फैशन !!! कल्चर !!! प्यार या धोंखा ???
- राघव सहाय
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