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चुनाव आयोग चुनावों से पहले ही बधाई का पात्र बन गया है

चुनाव आयोग चुनावों से पहले ही बधाई का पात्र बन गया है। पांच राज्यों में हो रहे चुनावों के रंग-ढंग को देखकर आम आदमी की चुनाव आयोग से उम्मीदें बढ़ी है। ये भरोसा चुनाव आयोग की सख्त कार्यप्रणाली को देखकर पैदा हुई है। पिछले कई चुनावों में धनबल और बाहुबलियों का जो प्रकोप दिखता था, वो इन चुनावों में काफी हद तक सीमित हो गया है।
उत्तर प्रदेश और पंजाब के चुनावों में जब्त किये गए करोड़ों रुपये इस बात की गवाही दे रहे हैं कि दागी और गलत मानसिकता वाले एक बार फिर धनतंत्र से लोकतंत्र को खरीदने की कोशिश में लगे हुए हैं। लेकिन चुनाव आयोग का हंटर इस कोशिश को लगातार नाकाम कर रहा है। जंग जारी है, लेकिन आम लोगों के अंदर चुनाव आयोग को लेकर जो विश्वास पैदा हो रहा है, वो इस बात का सबूत है कि आम आदमी किसी भी हालत में लोकतंत्र को धनतंत्र का बधुआ मजदूर बनाने को तैयार नहीं है। चुनाव आयोग की कोशिशों से उन लोगों को भी बल मिला है, जो अपनी साफ छवि और ईमानदार कोशिशों के दम पर चुनाव लड़ते हैं। चुनाव आयोग की हंटर के चलते ऐसे उम्मीदवारों को चुनाव जीतने की उम्मीदों को बल मिला है।
सवाल हार और जीत का नहीं है। सवाल उन तौर-तरीकों को लेकर है, जो भारत की दशा और दिशा तय करने का दम भरते हैं। क्या पैसे के बल पर चुनाव जीतने वाले कभी भी लोकतांत्रिक प्रणाली के लिए वो श्रद्धा और आदर रख पाएंगे, जो संविधान बनाते वक्त हमारे स्वतंत्रता सेनानियों ने रखा था।
भारत बदल रहा है, पहले अदालतों का सख्त रुख और अब चुनाव आयोग की सख्त कार्यप्रणाली इस बात की मिसाल है कि अब देश के लिए जिम्मेदार संस्थाएं केवल अपनी जिम्मेदारी ही नहीं निभा रही हैं बल्कि आम जनता के भरोसे को जीतने की भी भरपूर कोशिश में लगी हुई हैं। ऐसी कार्यप्रणाली के जरिए ही हम लोकतंत्र पर गर्व कर सकते हैं। अब बारी सत्तानशीनों की है, जिनके ऊपर आम आदमी को रोजगार और बेहतर और सुलभ स्वास्थ्य सेवाएं देने की जिम्मेदारी है।
- प्रसून शुक्ला
उत्तर प्रदेश और पंजाब के चुनावों में जब्त किये गए करोड़ों रुपये इस बात की गवाही दे रहे हैं कि दागी और गलत मानसिकता वाले एक बार फिर धनतंत्र से लोकतंत्र को खरीदने की कोशिश में लगे हुए हैं। लेकिन चुनाव आयोग का हंटर इस कोशिश को लगातार नाकाम कर रहा है। जंग जारी है, लेकिन आम लोगों के अंदर चुनाव आयोग को लेकर जो विश्वास पैदा हो रहा है, वो इस बात का सबूत है कि आम आदमी किसी भी हालत में लोकतंत्र को धनतंत्र का बधुआ मजदूर बनाने को तैयार नहीं है। चुनाव आयोग की कोशिशों से उन लोगों को भी बल मिला है, जो अपनी साफ छवि और ईमानदार कोशिशों के दम पर चुनाव लड़ते हैं। चुनाव आयोग की हंटर के चलते ऐसे उम्मीदवारों को चुनाव जीतने की उम्मीदों को बल मिला है।
सवाल हार और जीत का नहीं है। सवाल उन तौर-तरीकों को लेकर है, जो भारत की दशा और दिशा तय करने का दम भरते हैं। क्या पैसे के बल पर चुनाव जीतने वाले कभी भी लोकतांत्रिक प्रणाली के लिए वो श्रद्धा और आदर रख पाएंगे, जो संविधान बनाते वक्त हमारे स्वतंत्रता सेनानियों ने रखा था।
भारत बदल रहा है, पहले अदालतों का सख्त रुख और अब चुनाव आयोग की सख्त कार्यप्रणाली इस बात की मिसाल है कि अब देश के लिए जिम्मेदार संस्थाएं केवल अपनी जिम्मेदारी ही नहीं निभा रही हैं बल्कि आम जनता के भरोसे को जीतने की भी भरपूर कोशिश में लगी हुई हैं। ऐसी कार्यप्रणाली के जरिए ही हम लोकतंत्र पर गर्व कर सकते हैं। अब बारी सत्तानशीनों की है, जिनके ऊपर आम आदमी को रोजगार और बेहतर और सुलभ स्वास्थ्य सेवाएं देने की जिम्मेदारी है।
- प्रसून शुक्ला
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